अभी कुछ दिन पहले कि ही बात है। मैं मुंबई में चर्चगेट से अंधेरी जाने वाली 9.15 की लोकल ट्रेन में बैठा था। रात को शूट खत्म करके मैं घर जा रहा था। भीड़ कम थी इसलिए सीट बड़ी आसानी से मिल गई थी। मेरे दाहिनी तरफ भिन्डी बाजार के कुछ लड़के बैठे थे जो खालिस मुंबईया भाषा में बातचीत कर रहे थे। मुंबई में ऐसे लड़कों को टपोरी कहा जाता है और सभ्य लोग इनसे दूर रहने की ही कोशिश करते हैं।
इन लड़को के हंसी-मजाक का सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक लोअर परेल रेलवे स्टेशन पर कमला मिल्स में काम करने वाले ऑफिस के 4 बंदे हमारे सामने वाली सीट पर आकर नहीं बैठे। टाई और सूट-बूट में आए इन लड़कों की मुद्रा बेहद गंभीर थी। शायद किसी खास विषय पर ये ऑफिस से स्टेशन तक बात करते हुए आ रहे थे। लोकल लोअर परेल स्टेशन छोड़ चुकी थी। इनकी रास्ते की बात आगे बढ़ी। बातें छिड़ीं तो पता चला कि ये कसाब की सजा पर बात कर रहे थे।
क्यों भाई मैं गलत कह रहा हूं क्या, सरकार को तो कुछ पड़ी नहीं है, 7-11 के ट्रेन धमाके में क्या हुआ, मेरे कई जानने वाले मारे गए, क्या गलती थी बेचारों की लेकिन 3 साल हो गए किसी आरोपी को सजा हुई। दूसरा बोला, ठीक कहा यार, हमारा कानून ही ऐसा है। तीसरा बोला, अब कसाब को ही देख लो। आराम से बैठा है सैकड़ों लोगों की जान लेकर जेल में। उसे तो सजा दे देनी चाहिए जबकि वो खुद कह रहा है कि वह पाकिस्तानी है और उसी ने लोगों की हत्या की है। सिर्फ कुछ पैसों के लिए।
अब तक इन सफेद कपड़े और टाई-सूट पहने लोगों की बात सुन रहा टपोरी लड़कों का ग्रुप भी इनके बीच में कूद पड़ा। दूसरे ग्रुप में से आवाज आई- अबे कुछ नहीं होने का कसाब का, क्योंकि वो कसाब नहीं क-सांप है। बोले तो कानून का सांप, क्या-वो क्या है ना भिडू़ वो कानून को काट-काट कर ही जिन्दा रहेगा। क्योंकि आपुन के कानून में ही बड़ा झोल है, क्या समझा...बड़ा झोल। हमारी पुलिस का काम है पकड़ो और कानून का काम है टेररिस्ट को सांप बना के पालो।
इस बंदे की बात काटकर दूसरा भी बीच में ही बोल पड़ा-अरे अभी तो मेहमाननवाजी चल रही है भिडू़-अपुन के देश का वकील है,अपुन के देश का खाना है। मस्त एसी में सो रएला है और भिड़ू को गॉर्ड करने को बोलेला है। वो बाहर गांव से कोई इम्पोर्टेंट फोर्स को बुलाएला है। कसाब के लिए मस्त स्पेशल काट है, एसी है, सेपरेट टॉयलेट-बाथरूम है। 24 ऑवर्स गॉर्ड करने को वाचमैन टाइप का पुलिस है। बिरयानी खा-खा के मोटा हो रएला है। वो और जिस कंन्ट्री से वो आएला है उसको उसकी फिकरीच नहीं है। वो पाकिस्तान...मस्त पैकी बोल रएला है कि कसाब अपुन के कंन्ट्री का है पन अपुन नहीं लेने का उसको-
(तीसरा दूसरे की बात काटते हुए जोर से बोला)-हमारी इन्डिया के नेता लोग ही बिकेले हैं। नईं तो उस कसाब के बच्चे को दे दो अपुन की गैंग को हम देखते हैं उसमें कितना पावर है। वो हाथ में घोड़ा (बंदूक)लेके तो कोई भी शेर बन सकता है। ...लोकल दादर पहुंच चुकी थी। भिन्डी बाजार के ये टपोरी लड़के कसाब को गालियां देते दादर उतर गए लेकिन इन मस्तमौला लड़कों की बातों ने ट्रेन के उस डिब्बे में एक टॉकिंग टॉपिक छोड़ दिया।
उस डिब्बे में हर कोई बस कसाब की ही बाते करने लगा। मेरे मन में भी उन मस्तमौला लड़कों की मुंबईया भाषा में की गई बातें कौंध रही थीं। मैं सोचने लगा कि कसाब और पाकिस्तानी आतंकवादी या 26 नवंबर 2008 के आतंकी हमले का जिक्र आते ही भारत में रहने वाले हर नागरिक के मन में गुस्सा भर आता है। रगों में देशभक्ति का लहू बहने लगता है भले ही वो मनचले युवक हो या फिर बड़े पदों पर काम रहे अफसर।
सोचते-सोचते मेरे मन में भी 26-11 के उस आतंकी हमले की काली रात का भयावह दृश्य कौंध गया। मैं कैसे भूल सकता हूं कि उस मनहूस रात को मैं दो बार उस आतंकी हमले में अपनी जान गंवाते-गंवाते बचा। मेरे सर पर एके-47 को 15 सेकंड तक रखा गया था। मेरे ओबी वैन के बगल में ताज होटल में मौजूद लश्कर के आतंकियों ने हैंड ग्रेनेड फैंका था। मैं बिना खाए-पिए उस पूरी रात और लगातार तीन दिनों तक इस हमले की वारदात को कवर करता रहा।
मैं कैसे भूल सकता हूं कि महज 10 पाकिस्तानी आतंकियों ने 60 घन्टे तक मेरे 120 करोड़ लोगों वाले भारत की शान मेरी मुंबई को बंधक बनाए रखा। मैं ये कैसे भूल सकता हूं कि इस आतंकी हमले ने करकरे, काम्टे,सालस्कर,ओंबले,शशांक शिन्दे जैसे हमारे वीर सपूतों को शहीद कर दिया। 180 मासूमों की जान ले ली। 350 लोगों को गंभीर रूप से जख्मी कर दिया। क्यों, आखिर क्या दोष था मेजर उन्नीकृष्णन का या कमान्डर गजेन्द्र सिह का कि उन्हें अपनी शहादत देनी पड़ी। क्या सिर्फ ये कि वो अपना फर्ज निभा रहे थे। क्या इस हमले में दोषी वो नेता या इन्टेलीजेन्स ब्यूरो के अफसर नहीं हैं। वो ब्यूरोक्रेट या नौकरशाह नहीं हैं जिनको फरवरी 2008 से ही ये पता होते हुए भी देश में और खासकर मुंबई में आतंकी हमला होने वाला है उन्होंने कुछ नहीं किया।
आज 26-11 के हमले के एक साल बाद तमाम सुरक्षा के इंतजाम पूरे कर लिए गए हैं। 150 करोड़ से ज्यादा की रकम खर्च कर मुंबई में इस्राइल, जर्मनी, चीन, अमेरिका से अत्याधुनिक हथियार मंगा लिए गए है। एमपी सीरीज की मशीनगन, एक्स-रे वैन, मार्क्समैन बुलैटप्रूफ वैन, उच्चतम क्वॉलिटी के बुलेटप्रूफ जैकेट्स मंगवा लिए गए हैं लेकिन ये सब तब क्यों नहीं किया गया जब इसे करना जरूरी था।
क्या काम्टे, सालस्कर, करकरे, उन्नीकृष्णन की शहादत के लिए इस तरह की सरकारी लापरवाही जिम्मेदार नहीं है। 26-11 की पहली बरसी के पहले ही महाराष्ट्र के गृह मंत्री दुबारा बहाल कर दिए जाते हैं, डीजीपी को दुबारा उनकी कुर्सी दे दी जाती है। हटाए गए सीएम को प्रमोशन देकर कैबिनेट मंत्री बना दिया जाता है तो आखिर फिर इन्हें हटाने का ही नाटक क्यों रचा गया, क्या ये नेता या नौकरशाह इस बात का जवाब दे पाएंगे कि जिस आतंकी हमले की साजिश दो साल से पाकिस्तान में रची जा रही थी जिसकी तैयारी को अमलीजामा पहनाने डेविड हेडली, तहव्वुर राणा, फहीम अंसारी जैसे लश्कर-ए-तैयबा के स्लीपर सेल आतंकी मुंबई में बेखौफ घूमते रहे इनके बारे में इन्टेलिजेन्स को भनक तक क्यों नहीं लगी।
कैसे संभव हो जाता है कि हेडली या राणा जैसा खूंखार आतंकी मुंबई में कई साल तक रह कर चला जाए वह बॉलिवुड के सितारों से दोस्ती कर ले, बाकायदा किराए पर घर और ऑफिस ले ले, टेलिफोन, मोबाईल और सिम कार्ड खरीद ले, पार्टी करे, फाइव स्टार होटलों में रहे और एंजेसियों या सरकार को इसकी भनक तक ना लगे और इस पर जब 26-11 जैसा कोई अटैक हो तो यहीं नेता या नौकरशाह घड़ियाली आंसू बहाते कैमरे पर नजर आ जाए। क्यों नहीं अब तक 26-11 के 100 से ज्यादा पीड़ितों को उनका मुआवजा मिल पाया, उनकी सरकारी नौकरियां या पेट्रोल पंप मिल पाए क्या इसका जवाब कोई देगा।
मुझे जरा भी हैरानी नहीं हुई उस मनचले युवक की बात पर जब वो ये कह रहा था कि कसाब दरअसल भारत के लिए क-सांप बन चुका है जो 50 से ज्याद बेगुनाहो को खुद अपने हाथ से मार चुका है उसे एसी के सैल में रखा गया है। इन्डो तिब्बतन बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स जिसकी सुरक्षा में है। 50 लाख से ज्यादा खर्च कर जिसके लिए सुरंगनुमा जेल बनाई गई है। स्पेशल कोर्ट में जिसके मामले की सुनवाई चल रही है। सरकारी खर्चे पर जिसे वकील मिला है उसे भला किस बात का गम।
गम तो उन विधवाओं को है जिनका सुहाग उसने छीन लिया। कसाब तो आया ही था मरने के लिए और आज वो अपने जिन्दगी के बोनस दिनों को जी रहा है जिसका अब तक का कुल योग है 365 और हर दिन ये बोनस कसाब के जीवन में बढ़ता ही जाएगा। हमने कसाब को जिन्दा रखा ताकि पाकीस्तान को सबूत दिखा सकें। हमने उन 9 आतंकियो की लाशों को भी अब तक सहेजकर रखा है और जे.जे. अस्पताल में उनपर हर रोज 30 हजार से ज्यादा रुपए का खर्च हमें उठाना पड़ रहा है। इन लाशों को सड़न से बचाने के लिए विशेष कॉफिन बनाए गए हैं। विशेष शीतगृह बनाया गया है। इन आतंकियों के फिंगर प्रिन्ट, डीएनए सेम्पल पाकिस्तान को भेजे गए हैं लेकिन क्या पाक ने इन्हें अपने देश का मान लिया है। जवाब है-नहीं।
एक साल पूरा हो गया है 26-11 का लेकिन आज भी कई सवाल है जो करोड़ों भारतीयों के मन में जस के तस बने हुए हैं। क्या 26-11 के मुख्य साजिशकर्ताओं को फांसी मिलेगी, क्या लखवी, जरार शाह, अब्दुल रहमान, अबू हमजा को फांसी होगी, आखिर कसाब कब लटकाया जाएगा फांसी पर, क्या पाकिस्तान ये मानेगा कि उसकी धरती आतंकियों की शरणगाह बनी है और वो अपने देश से ऐसे आतंकी संगठनों को नेस्तनाबूत करने का बीड़ा उठाएगा, क्या मुंबई में दुबारा आतंकी हमला नहीं होगा, क्या देश में अब कोई बम नहीं फटेगा, ऐसे कई सवालनुमा लहरों के समुद्र में मैं गोते लगा ही रहा था कि तभी किसी ने जोर से आवाज दी....चलो भाई अंधेरी स्टेशन वाले आगे बढ़ो, मैं एकाएक उठा। मेरा स्टेशन आ गया था...














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