सोमवार, अपैल 06, 2009 14:24s
सबको शिक्षा से आएगा बदलाव
ये देश एक ऐसा देश है कि पूरी दुनिया में इसके जैसा कोई दूसरा आपको नहीं मिलेगा। एक ऐसा देश जहां इतनी सारी भाषाएं, धर्म, जातियां, कल्चर और भी बहुत सारी चीजें हैं।
जनरल इलेक्शन से अगले 5 सालों के लिए लोगों की तकदीर का फैसला होगा। और उस 5 साल की सरकार का असर सिर्फ 5 सालों तक ही नहीं होता बल्कि अगर गलत नीतियां हों तो अगले कई सालों तक हमें उसके प्रभावों के बर्दाश्त करना पड़ता है। ये हमारे देश के भविष्य का सवाल है।
पिछले 60 सालों में एक ऐसा वातावरण क्रिएट कर दिया गया है कि मुसलमान और हिंदू अलग रहें। हम एक दूसरे की परेशानियां सोचते नहीं हैं, फिक्र नहीं करते और जज्बात से सोचने की कोशिश नहीं करते कि हमारे सामने वाले के क्या इमोशंस हैं। मेरे ख्याल से चुनावों में धर्म, जाति के आधार पर वोटिंग करना सही नहीं है। ये एक चिंता का विषय है।
इंडियन डेमोक्रेसी में मुस्लिम पार्टिसिपेशन नंबर के ऐतबार से ठीक नहीं है और क्वॉलिटी के ऐतबार से तो जीरो है। सही मायने में पार्टियों ने मुस्लिम लीडरशिप को पॉलिटिकल स्पेस नहीं दिया। बल्कि उन लोगों को पॉलिटिकल स्पेस मिला जो पार्टियों के पॉलिटिकल लीडर हैं मुसलमानों के पॉलिटिकल लीडर नहीं हैं। जो जमीन से जुड़े हुए नेता थे और हैं उन्हें पार्टी ने मौका ही नहीं दिया। ऊपर पहुंचे वो जो पार्टी के नेता थे। मुसलमानों के नेता नहीं थे। उन्हीं को मौका मिल रहा है तो वो पीछे मुड़कर क्यों देखेंगे। मैं मानता हूं कि किसी नए पॉलिटिकल इस्टैबलिशमेंट की जरूरत है, पार्टी की जरूरत है। लेकिन सिर्फ इस्लाम और मुसलमान के नाम पर नहीं बल्कि जिन लोगों को न्याय नहीं मिला है वो सब एक साथ आगे बढ़ें।
अगर मुसलमान की बात करें तो उसे सिर्फ एजुकेशन की जरूरत है। अगर 20 साल का एक टारगेट मुसलमान सेट कर लें तो 20 साल में एक बदलाव आएगा, एक जनरेशन आएगी। एजुकेशन के मामले में हमने बहुत कोशिश की है। हमसे ज्यादा किसी ने नहीं की है इस देश में। हमारे 3 हजार से ज्यादा प्राइमरी स्कूल चलते हैं मदरसों के साथ। जहां मेन स्ट्रीम प्राइमरी एजुकेशन होती है। हमने लड़कियों के लिए टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज बनाया और अब आगे लड़कियों के लिए वेस्टर्न यूपी में मेडिकल यूनिवर्सिटी बनाने की सोच रहे हैं।
ये बहुत बड़ा मुल्क है तो सबसे पहले लोगों को इसके लिए तैयार करना है कि एजुकेशन की जरूरत क्यों है। हम मुसलमानों से ये कह रहे हैं कि तुम्हें बच्चों और बच्चियों को पढ़ाना है खासतौर से बच्चियों को। ये एक दिन का काम नहीं है। इसके लिए आपको 20 से 30 साल का टार्गेट सेट करना पड़ेगा। जो बच्ची आज पढ़ेगी उसी आगे वाली जेनरेशन उसका रिजल्ट होगी। तो 40 साल बाद यापको ये मालूम होगा कि हमने क्या खोया और क्या पाया।
मुझे अगर मौका मिलेगा तो मुस्लिम कम्यूनिटी ही नहीं बल्की सबके लिए एजुकेशन, प्राइमरी हेल्थ और समाज में आजादी के नाम पर जो नंगापन फैलाया जा रहा है जिससे हमारी नसल की नसल बर्बाद हो रही है उसको ठीक करने के लिए बोलूंगा। औरतों को बराबरी मिलनी चाहिए लेकिन कपड़े उतारने से बराबरी नहीं मिलती एटीट्यूड बदलने से बराबरी मिलती है। औरत को बाजार में खड़ा कर दिया और घर में उसके साथ वही ढंग है दहेज का भ्रूण हत्या का। ये कैसी आजादी है।
पोस्टेड महमूद मदनी at 14:24s 14 कमेंट्स
टोटल कमेंट्स
पोस्टेड बी Kapil B. Lomeo
You have rightly said that now muslims have to be educate themselves, and I think not only muslim community but all should educate themselves to boycott corrupted politicians, religious leaders and to fall a prey of mean fellows. But besides this I also think that it is also necessary for us to save the educated people, the youth to escape them from being misguided by terrorism, regionality and religionality. To change the mentality of some mean minded educated people is also necessary to achieve a clean society. ...
पोस्टेड बी Imran Malek
आपने जो भी लिखा है वो बहुत ही सही लिखा है और मैं आपसे पूरी तरह सहमत हू अब वो समय आ गया है की मुसलमानो को पड़ना लिखना बहुत ही ज़रूरी हो गया है, मैं आपके इस लेख की कदर करता हू और मुसलमानो को आप जैसे लोगो की ही ज़रूरत है ...
पोस्टेड बी Rajan
You are very right Madni Sir. Education is the only way which can guide some of the derailed Muslim who is in the path of terrorism, jihad. All Muslims should learn from you. Education is the only way by which people can think, otherwise I saw many of Muslims who is surviving by tailoring, butchering etc. We have to have all people in equal platform in our country in next 20 years and so, either he is Hindu or any other religion people. I salute your nice thinking.Insallah aisa hi hoga...Regards,Rajan ...
पोस्टेड बी Avinash
Very Very Right Sir,We all are proud to be Indian whether we are Hindu, Muslim, Shikh or Isai..... Even though our religion are different, we are one family.... We should keep trust within us and not to allow our neighbour country to damage our unity.... Now we young generations feels like not to vote anybody, because all they are thirsty for winning elections only.... If we want to keep our India peaceful, we really have to vote the right person. I request all my hindu, muslim, shikh and any other religion brothers to vote a right person, to care, to love to proud of our country. And I apeal all Indians to educate all our childrens to have India right top of the world.. Jai Hind. ...






























पोस्टेड बी JAVED USMANI
अक्सर जब किसी धर्म विशेष , जाति विशेष , क्षेत्र विशेष के पिछ्डेपन की बात करनी होती हैं तो लगभग सभी राजनेता शिक्षा की कमी का तर्क देकर अपनी जान बचा लेते हैं ऐसा करने मे सहूलियत हैं कि ,मन पर कोई बोझ नही रहता और बहुत सारे ऐसे सवालो के जबाब देने की जहमत नही उठानी पड्ती हैं जिनसे कहने और सुनने वालो का मन खट्टा हो . मदनी साहब का आलेख भी , उसी जान बचाऊ परंपरा की नयी कड़ी हैं . अफ़सोस हैं कि जब भी आदिवासी इलाक़ो मे विकास नही होने , मुसलमानो या कह लीजिए कि हर धर्म के ग़रीबो की ग़रीबी की बात चलती हैं तो लोग उन वजहो की चर्चा करने से ऐसे कतरा कर निकल जाते हैं जैसे मक्खन से छूरी निकल जाती हैं ,मदनी साहब ने मुसलमानो की तरक्की के लिए शिक्षा का पुराना राग अलापा हैं , पर उन्होने यह बताने की जहमत नही उठायी कि मुस्लिम शिक्षित क्यो नही हो सका ? आलेख से तो ऐसा लगता हैं कि मदनी साहब उन सारे मुसलमानो को जो उनके जैसे सम्पन नही हैं को इसलिए अपराध- बोध से ग्रसित करना चाहते हैं कि - ऐसे तमाम लोग अपनी बदतरी की वजह सिर्फ़ और सिर्फ़ तरक्की के लायक पढाई - लिखाई नही कर पाने को मानकर , सामाजिक ,धार्मिक ,व्यवसायिक स्तर पर स्थापित न हो सकने की वजह , अपनी अंदर की कमी को मान कर मूल मुद्दो की बात छोड दे . श्री मदनी जी की बातो से तो ऐसा लगता हैं कि मुस्लिम खुद अशिक्षा के लिए दोषी हैं ! जो कथित अवसरो की उपलब्धता - यथा सरकारी मदद , प्राथमिक शालाए , मदरसे और कुछ उच्च अध्ययन केंद्रो के होने के बाबजूद भी पढ़ते - लिखते नही हैं . सवाल यह हैं कि देश मे ग़रीब आदमी शिक्षित क्यो नही हो पाता हैं इसके लिए जो कार्य- योजानाए बनती हैं वह मानवीय भावनाओ के स्पर्श से क्यो डरती हैं , किसी भी धर्म को मानने वाला ग़रीब आदमी उम्र भर जहालत की तोहमत ढोना पसंद करता हैं पढाई के बजाए कमाई करना क्यो चाहता हैं ? इसका कारण उसकी परिवारिक परिस्थिति , ज़रूरते , मानवीय कर्तव्य , ज़ज्बात या नादानी हो सकती हैं पर श्री मदनी साहब जैसे हज़ारो राजनेता आज़ादी के साठ साल से ज़्यादा समय गुजर जाने के बाद भी अपनी बात से ग़रीबो को सहमत नही कर पाए यह अफ़सोस नाक हैं . और इसकी असली वजह यह हैं कि बीमार को दवा की ज़रूरत होती हैं पर बीमार को - समय पर- दवा मिलने के बदले डाक्टर बनाने की कोरी नसीहते मिलती हैं . तो वह तंदुरुस्त कैसे होगा .? मदनी साहब को यह नही भूलना चाहिए था कि अशिक्षा केवल मुसलमानो का भाग्य नही है . बल्की देश के हर ग़रीब तबके की लाइलाज बीमारी हैं और इसकी वजह , मानवीय सवेदना की कमी ,भ्रष्टाचार , हुकुमरानो ,जनता के प्रतिनिधियो , सामाजिक और धार्मिक मुखियाओ का वह गैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार भी हैं . जो नुस्ख़ा लिखने वाले की तरह बखूबी जानता हैं कि जो इलाज है - वह इतना महगा हैं , ग़रीब लाख सर पटके खरीद नही पायेगा . फिर भी उसे सेहतमंद होने के लिए ज़रूरी बताता हैं ! इसी दोहरेपन के कारण अपराधी अक्सर बच जाते हैं और सुरक्षा की अव्यवस्था के चलते शिकार बने लोगो के पास केवल फरियाद करने के लिए चाँद आँसुओ के सिवाए और कोई संपति नही बचती हैं . आलेख मे इसका सांकेतिक उल्लेख हैं परन्तु श्री मदनी जी जानते हैं कि इसे छेड्ने के बाद उनके बचाव की कोई सूरत नही बचेगी . मदनी जी ने मुस्लिम महिलाओ की शिक्षा पर ज़ोर दिया हैं पर ग़रीबी की तरह शिक्षा के आड़े आती परदा -प्रथा के बारे उन्होने खामोश ही रहना अपने अनूकूल समझा , बस नसीहत दे दी और सारे कर्तव्य पूरे कर लिए . इस तरह की आधी -अधूरी बातो से ना तो कोई समाज बना हैं न ही बनेगा . यह एहसास इसलिए भी ज़ोर मारता हैं कि शिक्षा पर ज़ोर देते -देते , मदनी साहब रुख़ बदल कर आधुनिक शिक्षा की विकृति का रोना लेकर बैठ गये कि - हर समाज को इससे बचना चाहिए मतलब सॉफ हैं कि आधुनिक शिक्षा से दूर रहना चाहिए जाहीर हैं आधुनिकता मे पर्दे जैसी दकियानूसी तो चलेगी नही , और यह बात श्री मदनी जी को भली लगेगी नही , ऐसे मे तो कूल मिलाकर उनका उद्देश्य मदरसे की पढ़ाई तक ही सीमित रह जाने का हैं फिर उपरी बाते किसलिए हैं यह समझना मुश्किल हैं . एक बात जो शीशे की तरह सॉफ हैं कि , ग़ुरबत से निकालने के लिए तालीम ज़रूरी हैं , पर ग़रीबी कभी तालीमायाफ़्ता होने नही देगी क्योकि दोनो एक दूसरे के विरोधाभाषी तथ्य हैं . और इस सच्चाई को हर शख्स जानता भी हैं और मानता भी हैं . यह सही हैं कि , शिक्षा सामूहिक प्रगति या एकल विकास के लिए ज़रूरी हैं , पर यह तभी संभव हैं , जब , कहने और करने वाले के मन मे कोई खोट ना हो और पाने वाले की कोई ऐसी लाचारी ना हो कि उसका इल्म और हुनर औरो की तरह बाजारू ना बन जाए ? ...
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