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सुकेश रंजन
Monday , June 01, 2009 at 18 : 37

संघ, सत्ता और बीजेपी


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बयान आ गया। संघ ने बीजेपी की हार की वजह तलाश ली है। संघ ने कह दिया कि राजनीति, लड़ाई मैदान में लड़ी जाती है एसी कमरों में बैठकर नहीं। हाईटेक प्रचार से नहीं जीते जाते चुनाव, जमीनी प्रबंधन जरूरी होता है। संघ के निशाने पर टीम आडवाणी के वैसे नेता भी हैं जो चुनाव की स्ट्रैटेजी तय कर रहे थे। संघ उवाच में इससे ज्यादा या कम की उम्मीद किसी को नहीं थी।

लेकिन क्या यही सच है। बात सन 77 की है। एंटी कांग्रेसिज्म चरम पर था। केन्द्र में पहली बार ऐसी सरकार बन रही थी जिसने कांग्रेस से सत्ता छीन ली थी। ये सरकार जनता पार्टी की थी और ये वो वक्त था जब जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया था लेकिन उसकी अलग पहचान अब भी कायम थी। जनसंघ के सामने एक यक्ष प्रश्न था। सरकार में शामिल होना है कि संगठन विस्तार और समाज निर्माण के काम को आगे बढ़ाना है। वाजपेयी ने स्टैंड लिया। स्टैंड क्या पंगा ले लिया। आडवाणी भी उनके साथ थे। संघ से शास्त्रार्थ हुआ कि क्या बिना सत्ता के संगठन का विस्तार हो सकता है। सत्ता संगठन की सीढ़ी है और अगर देश और समाज निर्माण की सोच को आगे बढ़ाना है तो सरकार में सहभागिता जरूरी है। संघ की कमान उस वक्त बाला साहब देवरस के हाथ थी। वाजपेयी की जीत हुई। तय हुआ कि ठीक है सरकार में शामिल होकर संघ विस्तार की परिकल्पना को पूरा करें। जनसंघ सरकार में शामिल हुई। वाजपेयी और आडवाणी सरकार में मंत्री बने।

ये निर्णय जनसंघ की राजनीति में मील का पत्थर था। जनसंघ और बाद में बीजेपी धीरे-धीरे आगे बढ़ी। रथ पर सवार हुई और उसके बाद 2 से 200 तक पहुंचने की कहानी सबको मालूम है। संगठन का विस्तार हुआ। बीजेपी ने देश की राजनीति को बाई पोलर पॉलिटिक्स में तब्दील कर दिया। छह साल तक केन्द्र में सत्ता में रही और आज कई प्रदेशों में बीजेपी की सरकार है।

बीजेपी में संभावनाएं ज्यादा थीं। पार्टी और आगे बढ़ सकती थी लेकिन संघ ने उसे अपने चंगुल से आजाद नहीं होने दिया। ये कड़वा सच है। संघ के साथ एक समस्या है। संघ राजनीति करता तो है लेकिन राजनीति करते दिखना नहीं चाहता। उसका मकसद समाज निर्माण का है लेकिन वो सामाजिक सरोकारों तक सीमित नहीं है। वो बीजेपी को अपने हिसाब से चलाना चाहता है। मार्गदर्शन तक तो ठीक है लेकिन इंस्पेक्टर की भूमिका में क्यों है ये संगठन। आडवाणी पाकिस्तान गए। जिन्ना पर बयान दिया। शायद ये अपनी छवि को सेक्यूलर बनाने की दिशा में एक कदम था। ये बयान संघ को रास नहीं आया। उसने हुक्म बजा दिया। जाना होगा। आडवाणी को बेइज्जत करके बीजेपी के अध्यक्ष पद की कुर्सी से हटा दिया गया। संघ ने आडवाणी को सम्मानजनक तरीके से हटने की मोहलत नहीं दी। लेकिन जब प्रधानमंत्री पद के लिए एक काबिल व्यक्ति की तलाश शुरू हुई तो धो-पोंछ कर आडवाणी को ही सामने कर दिया। संघ ने उस नेता को आगे बढ़ा दिया जिसकी मोरल अथॉरिटी खुद उसी ने खत्म कर दी थी।

एक और बात। संघ ने बीजेपी की दूसरी पंक्ति के नेताओं को पनपने ही नहीं दिया। अटल आडवाणी के बाद कौन। बीजेपी में जनाधार वाले जितने नेता थे, संघ की आंखों के सामने सभी पार्टी से चलता कर दिए गए और ये संगठन टुकुर-टुकुर देखता रहा। उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह हों, मध्य प्रदेश में उमा भारती हों, दिल्ली में मदन लाल खुराना हों, झारखंड में बाबूलाल मरांडी हों, सब के सब पार्टी से बाहर कर दिए गए और संघ मूक दर्शक बना रहा। ये सभी वैसे नेता थे जिन्हें संघ ने पैदा किया था। इतना ही नहीं। कई बार तो ऐसा लगा कि इतना बड़ा संगठन एक व्यक्ति से डरता है। जिस संघ को आडवाणी रास नहीं आए उसे लगता है कि आने वाले समय में अगर कोई संघ के एजेंडे यानी हिन्दुत्व को आगे बढ़ा सकता है वो मोदी ही हैं। वो मोदी जिन्होंने आडवाणी के संसदीय क्षेत्र गांधीनगर में मंदिरों पर बुल्डोजर चलवा दिया। अजीब विडंबना है कि संघ उस नरेन्द्र मोदी पर मेहरबान है जिन्होंने मोदित्व को तो आगे बढ़ाया लेकिन संगठन को तो खत्म ही कर दिया है। किसान संघ नाराज, विश्व हिन्दू परिषद नाराज, पुराने कर्मठ कार्यकर्ता नाराज लेकिन संघ ने चूं तक नहीं की। केशुभाई पटेल संघ के सामने रौंद दिए गए लेकिन संगठन को सर्वोपरि बताने वाला संघ आंखें बंद किए रहा।

बीजेपी अगर संघ के दम पर ही जीतती है तो केरल में आज भी उसका वजूद क्यों नहीं है। केरल में तो संघ की अच्छी खासी पैठ है तो फिर क्यों कुछ करिश्मा नहीं हुआ अब तक। आन्ध्र प्रदेश में सूपड़ा साफ क्यों है बीजेपी का। ये धारणा गलत है कि संघ के बिना बीजेपी का वजूद नहीं है।

अभी का उदाहरण लीजिए। बीजेपी चुनाव हार गई। बुरी तरह हार गई। संघ के नेता आडवाणी के घर आ धमके। तय हुआ कमान अब कोई और संभालेगा। लेकिन क्या हुआ। कुछ नहीं। क्योंकि आप भी ये तय नहीं कर पा रहे कि आडवाणी के बाद कौन। ये परिपाटी क्यों कि कोई भी निर्णय बिना आपकी सहमति के नहीं हो सकता। बीजेपी में पत्ता भी हिलेगा तो और कोई नहीं सीधा अध्यक्ष ही झंडेवालां पहुंचेगा, अनुमति लेगा और फिर उस निर्णय को अंतिम माना जाएगा। अजीब बात है, कांग्रेसियों पर आरोप लगाते हो कि 7 आरसीआर (प्रधानमंत्री का आवास) का रिमोट कंट्रोल 10 जनपथ ( सोनिया का आवास) पर है लेकिन बीजेपी का रिमोट अपने हाथ में रखना चाहते हो। ये दोहरा मापदंड क्यों।

संघ खुद को सांस्कृतिक संगठन कहता है फिर बीजेपी की राजनीति में इतनी दखलंदाजी क्यों। राजनीतिक दल को राजनीति करने दो। राजनीति समय के साथ बदलने का नाम भी है। वाजपेयी ने बदला था। आडवाणी ने कोशिश की लेकिन आपने ब्रेक लगा दिया। संघ का डंडा बीजेपी को न उठने देता है न बैठने। राम मंदिर, धारा 370 और समान आचार संहिता- इन सबको छोड़ना भी नहीं है और इक्कसवीं सदी की राजनीति भी करनी है। ये तो कुछ ऐसा हुआ जैसे आप बीजेपी को कह रहे हो उल्टे खड़े हो जाओ और अब चलो। संघ ही ये तय करता है कि कौन रहेगा कौन जाएगा। सरकार बनेगी तो फिर तय करेगा कि कौन क्या पाएगा और वही पाएगा जो संघ के एजेंडे को आगे बढ़ाएगा। सरकार आएगी तो संघ का एक नुमाईंदा सरकार और संगठन के बीच पुल का काम करेगा। ये क्यों। संघ को इससे क्या मतलब। याद करिए वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो मदनदास देवी 7 आरसीआर में ऐसे घुसते थे जैसे वाजपेयी को गद्दी पर इसी संघ ने बिठाया है।

वाजपेयी 2004 में हार गए। और उसी वक्त संघ ने आडवाणी की हार भी तय कर दी। 75 साल के आरएसएस प्रमुख सुदर्शन ने बयान दे दिया। अटल, आडवाणी को रिटायर हो जाना चाहिए। क्या संदेश गया। दुनिया जानती थी कि अटल के बाद आडवाणी ही बीजेपी की कमान संभालने वाले हैं।

हर चीज में संघ की राय होगी और ये भी होगा कि जो राय संघ की है वही बीजेपी की भी हो। आतंकवाद की घटना की निंदा करेंगे लेकिन अगर कोई हिन्दू संगठन किसी आतंकी घटना का आरोपी है तो हल्ला मचाएंगे और बीजेपी से भी हल्ला मचवाएंगे कि अनर्थ हो रहा है हिन्दुओं का अपमान हो रहा है। अब संघ का क्या नुकसान होगा। बीजेपी का हो रहा है।

असली खतरा तो अब है। अटल, आडवाणी का युग खत्म हो चुका है। संघ की कमान अब मोहन भागवत के हाथों में है और सालों तक रहने वाली है। अटल, आडवाणी तो बहस भी कर सकते थे लेकिन राजनाथ, सुषमा, वेंकैया तो संघ के आगे बौने होंगे और संघ की विश लिस्ट बहुत लंबी होगी।

बीजेपी और संघ के रिश्ते पुराने हैं लेकिन अब उसे दोबारा परिभाषित करने की जरूरत है। नहीं तो बीजेपी भी लेफ्ट के रास्ते पर चल निकलेगी। जहां सोच वही पुरानी है और चुनौतियां नई हैं।

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सुकेश रंजन के बारे में कुछ और

दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन के बाद पिछले 13 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय। शुरुआत दूरदर्शन के प्रोग्राम 'रोजाना' से की। फिर आज तक से जुड़े। आज तक में रहते हुए कई बड़ी खबरें कीं। गुजरात दंगों की पीड़ित जाहिरा शेख के खातों का खुलासा इनकी बड़ी खबरी में से एक। इसके बाद आईबीएन7 से जुड़े। आईबीएन7 से जुड़ने के बाद तत्कालीन रेल मंत्र लालू यादव के खिलाफ पैसे के बदले नौकरी का खुलासा किया। फिलहाल चैनल के राजनीतिक संपादक।
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