आनंदी ने जीत लिया ‘दादीसा’ का दिल

TimeThu, Nov 20, 2008 at 13:54 , Updated at Thu, Nov 20, 2008 मनोरंजन सेक्शन

Tagsटैग: Balika, Vadhu | 0 कमेंट्स

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आनंदी का बिलख बिलख कर रोना आखिरकार दादीसा का दिल पसीज जाता है और दादी सा आनंदी को ढाढस बंधाती है।

आनंदी का बिलख बिलख कर रोना आखिरकार दादीसा का दिल पसीज जाता है और दादी सा आनंदी को ढाढस बंधाती है।

            

मुंबई। आनंदी बेमन से ससुराल तो लौट आती है लेकिन दादीसा के ताने आनंदी का जीना दूभर कर देते हैं। आनंदी पर तो मानों दुखों का पहाड़ टूट पड़ा हो। पहले तो उसे दादीसा से मिली सजा और अब लग गया चोरी का इल्जाम।

घर जाने के लिए आनंदी ने रोज की आरती के पैसे अपने भगवान जी से उधार मांगे थे। मासूस आनंदी को क्या पता था कि भगवान से पैसे लेना दादीसा के शब्दों में चोरी है।

चोरी का इल्जाम लगने से आनंदी मुरझा सी गई है। चुलबुली,चहकती,हंसती खेलती आनंदी तो जैसे ठहर सी गई है। उसे अब खेलना अच्छा नहीं लगता। अब वो अपने ढेरों सवाल भी नहीं पूछती। आनंदी अब काम करने की जिद करती है। रोटी बिना घी लगाए खाने की जिद करती है। पूरे मन से सासु मां के काम में हाथ बटांती है।

लगता है आनंदी ने ससुराल के सारे नियमों को अपना धर्म मान लिया है। अब अपने मां-बाप को अपनी तरफ से कोई परेशानी नहीं देने का ठान लिया है। आनंदी ने तो बस मां-बाप का दुख देखकर अपने मन को मार लिया है।

आनंदी के सास-ससुर भी बदली-बदली सी आनंदी को देख घबराए हुए हैं। आनंदी के निर्मल मन पर क्या बीत रही होगी ये सोचकर उनका बुरा हाल हो गया है।

लेकिन दादीसा के सामने बेबस हो बस आनंदी पर हो रहे अत्याचार को भीगी आखों से देखते रहते हैं सोचते हैं कैसे आनंदी हर पल अपने इच्छाओं को दबाती होगी। कैसे आनंदी अंदर ही अंदर घुटती होगी। कहीं आनंदी खुद को अच्छी बहू साबित करने की कोशिश में अपने मां-बाप को बचाने की कोशिश में अपना बचपन न खो दे।

आनंदी के आंसू चीख चीख कर कहते हैं कि उसने कोई चोरी नहीं की लेकिन कल्याणी देवी के सामने किसकी चलती है। छोटी सी उम्र में अपने मां -बाप का घर छोड़ आई आनंदी को तो ससुराल में कोई बात करने वाला भी नहीं मिल रहा। लेकिन तभी एक चमत्कार होता है। आनंदी ने सोचा भी नहीं था कि भगवान उसकी इतनी जल्दी सुन लेंगे।

आनंदी का बिलख बिलख कर रोने से आखिरकार दादीसा का दिल पसीज जाता है और दादी सा आनंदी को ढाढस बंधाती है। बछिया की तरह आनंदी को सिर हिलाते देख दादीसा की ममता छलक पड़ती है। मांसा बड़े प्यार से आनंदी को घर के कायदे कानून सिखाती हैं। प्यार से पुचकारकर आनंदी को टीवी चलाना भी सिखा देती हैं।

अंदर ही अंदर दादीसा भी आनंदी के दर्द को समझ रही हैं दादीसा के प्यार को देख आनंदी तो चहक पड़ती है। पल भर में दादीसा के प्यार ने आनंदी की दुनिया ही बदल डाली।

अब तो आनंदी दादीसा को चाय भी पिलाती है। खाना खुद बनाकर दादीसा को खाने पर मजबूर भी करती है। मनमोहिनी आनंदी का तो अब जादू सा चल गया है दादीसा पर।

उधर खजान सिंह -आनंदी के पिता आनंदी की कुशलता जान कर खुशी से झूम उठते हैं। उनके सारे दुख दर्द आनंदी के ससुराल से आई चिठ्ठी ने क्षण भर में छू मंतर कर दिए। छोटी आनंदी की बड़प्पन की दास्तां सुन मां बाप दोनों के आखों में आंसू छलक आए।

आनंदी भी अब खुश है। दादीसा के कमरे में अपनी सासू मां के साथ खानदानी गहनों को भी देखने जाती है। अपने निश्छल मन से दादीसा के गहनों की खूब तारीफ भी करती है।

दादीसा से बेबाक तरीके से बात करते हुए आनंदी की सासू मां सहम सी जातीं हैं। डर लगता है कि कहीं आनंदी को फिर से दादीसा की बेरुखी न झेलनी पड़े लेकिन दादीसा भी आनंदी को बड़े प्यार से जवाब देती हैं।

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