नई दिल्ली। एक ऐसी सुरीली आवाज जिसे सुनकर उसकी काबिलियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन तब यकीन होता जब ये पता चलता है कि जिस गले से ये सुर निकल रहे हैं। उस गले से शब्द नहीं निकल सकते। 14 साल की लड़की बेंजी बोल नहीं सकती। लेकिन बेहद सुरीली आवाज में गा सकती है।
जन्म से ही बेंजी के शरीर का बायां हिस्सा और बायां दिमाग काम नहीं करता है। बेंजी दूसरे बच्चों जैसी नॉर्मल नहीं थी। जिससे उसका मानसिक विकास नहीं हो पाया। किसी काम को ठीक से नहीं कर पाती थी। लेकिन उसमें एक खास बात थी संगीत के सुरों की पहचान।
4 साल की उम्र में बेंजी के माता-पिता समझ गए थे की उनकी बेटी कभी भी दूसरे बच्चों की तरह सामान्य नहीं होगी। बचपन से ही बेंजी का झुकाव संगीत की तरफ था। बाकी बच्चे जब सुरों के उतार-चढ़ाव को समझ नहीं पाते। तब बेंजी इन्हें आराम से समझ लेती थी और दोहराने की कोशिश करती। बेंजी के माता-पिता को मानो एक रास्ता मिल गया।
उन्होंने बेंजी को म्यूजिक थेरेपी देनी शुरू की। वो उसके कमरे में सुबह-शाम महामृत्युंजय मंत्र, सुबह और शाम के राग, गायत्री मंत्र बजा देते थे। बेंजी की सुबह और शाम इसी संगीत के साथ होने लगी। दिनभर उसके कानों में यही सुर गूंजते रहते। जब बेंजी चार साल की हुई तो माता-पिता ने उसके लिए म्यूजिक टीचर रख दिया। लेकिन ये बेंजी के लिए इतनी सहज थी। उसे सिखाना इतना आसान नहीं था। म्यूजिक टीचरों ने हार मान ली।
लेकिन बेंजी के माता-पिता ने हार नहीं मानीं। बेंजी को गुरु के रूप में एमएम रफी मिल गए। इसके बाद पांच साल तक उन्होंने बेंजी को संगीत का ककहरा सिखाया। बेंजी को पहले से ही सुरों के जादू का असर समझ आता था। और अब वो बाकायदा सुर-ताल से खेलने लगी। उस समय समस्या ये थी कि बेंजी को बोल याद रखना। बेंजी ने इसका भी रास्ता निकाल लिया। वो उन्हें रट लेती थी। इसके बाद बेंजी का स्टेज पर सफर शुरू हो गया। इस बीच गुरु की मौत हो गई और बेंजी को मिले नए गुरु रामजी मिश्रा। दो साल से वो उन्हीं की संगत में संगीत सीख रही है।
हर बच्चे में एक हुनर होता है। लेकिन हर बच्चे को अपने उस हुनर को साकार करने का मौका नहीं मिल पाता है। इस मायने में बेंजी काफी किस्मत वाली है। उसके माता-पिता ने उसकी कमजोरी को उसकी ताकत में बदलने का रास्ता निकाला। संगीत ने बेंजी को नई जिंदगी दी है। अपनी नई पहचान के साथ बेंजी अब दुनिया में कोई भी मुकाम हासिल कर सकती है।
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